शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

शब्दावली

शास्त्रों की मूल संकल्पनाएँ और शब्द — धर्म, कर्म, यज्ञ, अवतार आदि।

धर्मकर्तव्य और नैतिक नियमों का सिद्धांत, चार पुरुषार्थों में प्रथम।कर्मक्रिया और उसके फल का सिद्धांत, जन्म-मरण का आधार।यज्ञअग्नि में आहुति द्वारा देवताओं की आराधना, वैदिक कर्म का केंद्र।अवतारईश्वर का धर्म-रक्षा हेतु पृथ्वी पर जन्म लेना, विष्णु के दशावतार।पुरुषार्थमानव-जीवन के चार उद्देश्य — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।चार वेदऋग्, यजुर्, साम और अथर्व — चार वेद, हिन्दू श्रुति का आधार।वेदांगवेदों को समझने के छह सहायक शास्त्र — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।उपनिषदवेदों का ज्ञान-कांड, ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप का सिद्धांत।भगवद्गीताकुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश, अठारह अध्याय।मोक्षजन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, चार पुरुषार्थों में अंतिम।मायाईश्वर की वह शक्ति जो जगत को वास्तविक प्रतीत कराती है, अविद्या।त्रिदेवब्रह्मा, विष्णु और शिव — सृष्टि, पालन और संहार के तीन देव।चतुर्युगसत्य, त्रेता, द्वापर और कलि — चार युगों का चक्र।मन्वंतरएक मनु का शासन-काल; एक कल्प में चौदह मन्वंतर होते हैं।ऋषितपस्या और मंत्र-दर्शन करने वाले महात्मा, वेद-मंत्रों के द्रष्टा।पुराणव्यास से जुड़े अठारह महापुराण, सृष्टि और देव-कथाओं का संग्रह।स्मृतिऋषियों द्वारा स्मरण किए गए धर्म-ग्रंथ, जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति।संस्कारजीवन को शुद्ध और धर्म-अनुकूल बनाने वाले सोलह मुख्य वैदिक कर्म।ऋग्वेदचार वेदों में प्राचीनतम; देवताओं की स्तुति के सूक्त दस मण्डलों में संकलित।यजुर्वेदयज्ञ-विधान और कर्मकाण्ड का वेद; गद्य-पद्य मन्त्रों में यज्ञ की विधियाँ।सामवेदगान-प्रधान वेद; ऋग्वेद के मन्त्रों का गेय रूप और भारतीय संगीत का मूल।अथर्ववेदअथर्वा ऋषि का वेद; दैनिक जीवन, रोगनाश, रक्षा और ब्रह्मविद्या के मन्त्र।ब्राह्मण ग्रंथवेदों के गद्य भाग; यज्ञ-विधियों का विवेचन और उनके अर्थ का निरूपण।आरण्यकवन में पढ़े जाने वाले वेद-भाग; कर्मकाण्ड से ज्ञान की ओर संक्रमण।षड्दर्शनवेद को प्रमाण मानने वाले छह दर्शन; सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त।वेदांतउपनिषदों पर आधारित दर्शन; ब्रह्म और आत्मा की एकता का सिद्धांत।सांख्यप्रकृति और पुरुष के द्वैत पर आधारित दर्शन; पच्चीस तत्वों की गणना।योग दर्शनपतंजलि-प्रणीत दर्शन; चित्त-वृत्तियों का निरोध और अष्टांग-मार्ग।न्यायतर्क और प्रमाण का दर्शन; सोलह पदार्थों के तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस।मीमांसापूर्व-मीमांसा; वेद-विहित धर्म और यज्ञ-कर्मकाण्ड का विवेचन।ब्रह्मसूत्रबादरायण-प्रणीत वेदान्त का सूत्र-ग्रंथ; उपनिषद्-सिद्धान्तों का तर्कपूर्ण संकलन।आत्माप्रत्येक प्राणी का चेतन स्वरूप; देह-इन्द्रिय-मन से भिन्न, अविनाशी साक्षी।ब्रह्मपरम सत्य और जगत् का मूल कारण; सच्चिदानन्द, निर्गुण-सगुण स्वरूप।जीवअविद्या से बद्ध व्यक्ति-चेतना; अपने स्वरूप को भूला हुआ आत्मा।प्रकृतिसांख्य-योग की मूल जड़ सत्ता; तीन गुणों की साम्यावस्था।पुरुषसांख्य का चेतन तत्त्व; कूटस्थ, अकर्ता, द्रष्टा-स्वरूप आत्मा।संसारजन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म का चक्र; कर्म और अविद्या से चलने वाला बन्धन।पुनर्जन्ममृत्यु के बाद कर्मानुसार नए शरीर में जन्म; संसार-चक्र का आधार।स्वर्गदेवताओं का लोक; पुण्य-कर्म के फल का भोग-स्थान, जो अनित्य है।नरकपाप-कर्म के फल-भोग का नीच लोक; यमराज के अधीन दुःख-स्थान।वैकुंठभगवान विष्णु का नित्य धाम; दुःख-मृत्यु से रहित, स्वयंप्रकाशमान लोक।गोलोकश्रीकृष्ण का परम धाम; गौ-गोप-गोपियों से युक्त, वैकुंठ से भी ऊपर का नित्य लोक।पातालपृथ्वी के नीचे स्थित सात अधोलोकों में सातवाँ तथा सबसे नीचे का लोक; नागों और नागराज वासुकि का निवास।सप्तलोकपुराणों में वर्णित ऊर्ध्व दिशा के सात लोक — भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य।चातुर्वर्ण्यसमाज के चार वर्ण — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र; गुण और कर्म पर आधारित विभाजन।वर्णाश्रमचार वर्ण तथा जीवन के चार आश्रम — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास पर आधारित व्यवस्था।तपस्याशरीर, वाणी और मन को संयमित कर श्रेष्ठ लक्ष्य के लिए की जाने वाली कठोर साधना; तप से आत्मिक तेज उत्पन्न होता है।भक्तिईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति; मोक्ष का सरलतम मार्ग, जिसमें भक्त और भगवान का सीधा संबंध होता है।ज्ञानतत्त्व का साक्षात् बोध — आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान, जो मोक्ष का मार्ग है।मंत्रवह पवित्र वाक्य या ध्वनि जिसका निरंतर मनन और जाप मनुष्य की रक्षा तथा आत्मिक उन्नति करता है।तंत्रसाधना की वह पद्धति जिसमें मंत्र, यंत्र, देवता-आराधना तथा विधि-विधान से शीघ्र सिद्धि प्राप्त की जाती है।शक्तिब्रह्म की वह क्रियाशील शक्ति जो सृष्टि को उत्पन्न, पालन तथा संहार करती है; देवी के रूप में पूजित।शक्तिपीठवे पवित्र स्थान जहाँ माता सती के अंग-अलंग गिरे थे; शक्ति-उपासना के प्रमुख तीर्थ।इतिहासऐसा ही हुआ — रामायण तथा महाभारत को कहा जाने वाला इतिहास-ग्रंथ, जो धर्म तथा नीति की शिक्षा देता है।ज्योतिषग्रह-नक्षत्रों की गति से काल तथा मनुष्य-जीवन का फल बताने वाला वेदांग शास्त्र; वेदों का नेत्र।गायत्री मंत्रवेदमाता गायत्री का मंत्र; सविता देवता को समर्पित सर्वाधिक पवित्र वैदिक मंत्र।ॐप्रणव या ओंकार — ब्रह्म का शब्द-स्वरूप, जिसमें समस्त वेद तथा सृष्टि समाहित हैं।अधर्मधर्म का विपरीत — शास्त्र-विरुद्ध तथा अन्यायपूर्ण आचरण, जो पतन तथा दुःख की ओर ले जाता है।पुण्यशुभ कर्मों का अर्जित फल; वह शुभ संस्कार जो सुख, स्वर्ग तथा उत्तम जन्म देता है।पापशास्त्र-निषिद्ध तथा हिंसक कर्मों से अर्जित दोष; वह अशुभ कर्म-फल जो दुःख तथा नरक देता है।दानअपनी वस्तु का योग्य पात्र को निःस्वार्थ भाव से अर्पण; धर्म का प्रमुख अंग तथा पुण्य का साधन।व्रतशास्त्र-विहित नियमों तथा उपवास का श्रद्धापूर्वक पालन; संकल्प से ली गई धार्मिक प्रतिज्ञा।श्राद्धपितरों को श्रद्धापूर्वक अर्पित तर्पण तथा अन्न-दान; मृत पूर्वजों के लिए किया जाने वाला विधि-कर्म।जपमंत्र का विधिपूर्वक, ध्यानपूर्वक तथा निश्चित संख्या में पुनरावर्तन; साधना का सरल साधन।हवनअग्नि में आहुति द्वारा देवताओं का आवाहन तथा तर्पण; गृह्य-कर्मों का पवित्र अनुष्ठान।गुरु-शिष्यज्ञान-हस्तांतरण की पवित्र परंपरा; जिसमें शिष्य गुरु की शरण में रहकर विद्या तथा जीवन-दर्शन सीखता है।