भगवद्गीता
शब्दावली
अन्य नाम: भगवद्गीता, गीता, श्रीमद्भगवद्गीता
भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है, जिसमें कुरुक्षेत्र में युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया। इसमें अठारह अध्याय और लगभग सात सौ श्लोक हैं।
शास्त्रीय आधार: गीता तीन मार्गों का समन्वय करती है — कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। यह वेदांत का सार मानी जाती है और इसे 'उपनिषदों का सार' कहा गया।
विस्तृत अर्थ: गीता में आत्मा की अमरता, स्वधर्म-पालन, निष्काम कर्म, ईश्वर-भक्ति और शरणागति के सिद्धांत हैं। यह मोह-ग्रस्त अर्जुन को कर्म के लिए प्रेरित करती है।
उदाहरण: अर्जुन के विषाद से आरंभ होकर गीता विश्वरूप-दर्शन और 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' की शरणागति पर समाप्त होती है।
प्रसिद्ध कथन
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।' — कर्म में ही अधिकार है, फल में नहीं। (भगवद्गीता 2.47)
'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।' — सब धर्म छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। (भगवद्गीता 18.66)
संबंधित
स्रोत: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)