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धर्म

शब्दावली

अन्य नाम: धर्म

पुरुषार्थकर्तव्यनैतिकता

धर्म शब्द 'धृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना — जो प्राणियों को धारण करता है वह धर्म है। शास्त्रों में धर्म को जीवन-व्यवस्था, कर्तव्य और नैतिक नियम का आधार कहा गया है।

शास्त्रीय आधार: धर्म का निर्धारण वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मसंतोष — इन चार प्रमाणों से होता है। मनुस्मृति में दस धर्म-लक्षण गिनाए गए हैं: धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय-संयम, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध।

विस्तृत अर्थ: धर्म व्यक्ति के वर्ण, आश्रम, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता है — इसीलिए 'स्वधर्म' और 'परधर्म' का भेद किया गया। गीता में स्वधर्म-पालन को श्रेयस्कर कहा गया। धर्म का संबंध केवल व्यक्ति से नहीं, समाज और प्रकृति से भी है।

उदाहरण: युधिष्ठिर को 'धर्मराज' कहा गया; गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को धर्म-संस्थापन के लिए कर्म करने को कहते हैं। राजा का धर्म प्रजा-पालन और ब्राह्मण का धर्म अध्ययन-अध्यापन आदि वर्ण-आश्रम-धर्म कहे गए हैं।

प्रसिद्ध कथन

'धारणाद्धर्म इत्याहुः धर्मेण विधृताः प्रजाः।' — धारण करने से धर्म कहलाता है, धर्म से प्रजा धारण की जाती है। (भावानुवाद, महाभारत की उक्ति)
'धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।' — धर्म का नाश करने वाले का धर्म नाश करता है, धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। (मनुस्मृति 8.15)

संबंधित

कर्मपुरुषार्थमोक्षचार वेदस्मृतिअर्जुन

स्रोत: मनुस्मृति, महाभारत, भगवद्गीता