आत्मा
शब्दावली
अन्य नाम: आत्मन्, आत्म तत्त्व
आत्मा प्रत्येक प्राणी का वास्तविक स्वरूप है — नित्य, अविनाशी और देह, इन्द्रिय तथा मन से भिन्न। उपनिषदों का मुख्य उपदेश आत्मा का बोध है, और इसीलिए इन्हें आत्मविद्या कहा जाता है। आत्मा स्वयं प्रकाशित है और ज्ञान-क्रिया का साक्षी है।
चार महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की एकता बताते हैं — "अहं ब्रह्मास्मि" (बृहदारण्यक), "तत्त्वमसि" (छान्दोग्य), "प्रज्ञानं ब्रह्म" (ऐतरेय) और "अयमात्मा ब्रह्म" (माण्डूक्य)। उपनिषद् "नेति नेति" के द्वारा आत्मा को देह, मन और इन्द्रियों से अलग करते हुए शुद्ध चेतन स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
माण्डूक्य उपनिषद् आत्मा की चार अवस्थाएँ बताता है — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। पहली तीन अवस्थाओं से परे तुरीय अवस्था शुद्ध आत्मा का स्वरूप है। भगवद्गीता में आत्मा को अजन्मा और अमर बताया गया है — "न जायते म्रियते वा कदाचिन्"।
इस शरीर में आत्मा का बोध हो जाने पर देह-मोह और भय नष्ट होते हैं। आत्मज्ञान ही मोक्ष का मार्ग माना गया है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद