मीमांसा
शब्दावली
अन्य नाम: पूर्व मीमांसा, कर्म मीमांसा, मीमांसा दर्शन
मीमांसा (पूर्व-मीमांसा अथवा कर्म-मीमांसा) के प्रणेता महर्षि जैमिनि माने जाते हैं और इसका आधार ग्रंथ मीमांसासूत्र है, जिसमें बारह अध्याय हैं। यह वेद के कर्मकाण्ड भाग की व्यवस्थित व्याख्या करता है और वैदिक यज्ञों के अर्थ तथा नियमों का विवेचन करता है।
इसका प्रथम सूत्र है "अथातो धर्मजिज्ञासा" अर्थात् अब धर्म की जिज्ञासा। धर्म का लक्षण दिया गया है — "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः", अर्थात् वेद-विहित प्रेरणा से जो कल्याणकारी पदार्थ जाना जाए, वह धर्म है। मन्त्रों का मुख्य अर्थ विधि (कर्म का आदेश) में माना जाता है और शेष भाग अर्थवाद।
यज्ञ-कर्म से उत्पन्न अदृष्ट शक्ति को "अपूर्व" कहा जाता है, जो कर्मफल की नियामक है। मीमांसा वेद को नित्य और अपौरुषेय मानती है। कुमारिल भट्ट और प्रभाकर इसके दो प्रमुख आचार्य हैं, जिनके मतभेद से दो शाखाएँ बनीं।
परम्परा में मीमांसा को निरीश्वरवादी माना जाता है, क्योंकि यह कर्म-फल की व्यवस्था के लिए ईश्वर को आवश्यक नहीं मानती। न्याय के चार प्रमाणों के अतिरिक्त यह अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को भी प्रमाण स्वीकार करती है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: मीमांसासूत्र