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कर्म

शब्दावली

अन्य नाम: कर्म, कर्म-सिद्धांत

कर्मफलसिद्धांतपुनर्जन्म

कर्म का अर्थ है किया गया कार्य। शास्त्रों में कर्म को जीव के सुख-दुख तथा जन्म-मरण का कारण माना गया है।

शास्त्रीय आधार: कर्म के तीन भेद किए जाते हैं — संचित (पूर्वजन्मों के संचित कर्म), प्रारब्ध (जो फल देने लगे) और क्रियमाण (वर्तमान में किए जा रहे कर्म)। गीता में कर्म-योग का सिद्धांत दिया गया — फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना।

विस्तृत अर्थ: कर्म-सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है, चाहे इस जन्म में या अगले में। अच्छे कर्म पुण्य और बुरे कर्म पाप बनते हैं; इन्हीं से जीव की गति निर्धारित होती है।

उदाहरण: कर्ण को पूर्वजन्म के कर्मों का फल माना जाता है; दुर्योधन के कर्मों से महाभारत-युद्ध हुआ। गीता में कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य स्वभाव-जनित कर्म से बँधा है।

प्रसिद्ध कथन

'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।' — कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। (भगवद्गीता 2.47)
'न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।' — कोई भी क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। (भगवद्गीता 3.5)

संबंधित

धर्ममोक्षपुरुषार्थकर्णअर्जुनश्रीकृष्ण

स्रोत: भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र, महाभारत