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न्याय

शब्दावली

अन्य नाम: न्याय दर्शन, अक्षपादीय न्याय

दर्शनतर्कप्रमाणनिःश्रेयस

न्याय दर्शन के प्रणेता अक्षपाद गौतम माने जाते हैं और इसका आधार ग्रंथ न्यायसूत्र है। यह भारतीय तर्कशास्त्र का प्रधान दर्शन है, जो प्रमाण, अनुमान और विवाद के नियमों का विश्लेषण करता है। इसका लक्ष्य केवल शास्त्रार्थ नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान द्वारा मोक्ष है।

न्यायसूत्र के प्रथम सूत्र में सोलह पदार्थ गिनाए गए हैं — प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान। इनके तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

न्याय चार प्रमाण मानता है — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। वाद (सत्य-अन्वेषण हेतु विवाद) की तुलना में जल्प (विजय हेतु विवाद) और वितण्डा (केवल खण्डन) को हीन माना गया। न्याय और वैशेषिक प्रायः जोड़ी में पढ़े जाते हैं।

बारहवीं शताब्दी में गंगेश उपाध्याय की तत्त्वचिन्तामणि से नव्य-न्याय की परम्परा आरम्भ हुई, जिसने भारतीय तर्क को नए रूप में विकसित किया।

प्रसिद्ध कथन

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः (न्यायसूत्र 1.1.1) — भावानुवाद: इन सोलह पदार्थों के तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

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षड्दर्शनमीमांसावेदांतज्ञानधर्म

स्रोत: न्यायसूत्र