योग दर्शन
शब्दावली
अन्य नाम: योग, पातञ्जल योग, राजयोग
योग दर्शन महर्षि पतंजलि के योगसूत्र पर आधारित है। इसकी मूल परिभाषा है — योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। जब चित्त की वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। यह दर्शन केवल मत नहीं, बल्कि साधना-प्रधान शास्त्र है।
योगसूत्र के चार पाद हैं — समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य। साधना का मार्ग आठ अंगों में बाँटा गया है — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। अभ्यास और वैराग्य इसके दो मुख्य साधन हैं।
इसके सिद्धान्त सांख्य के निकट हैं — प्रकृति और पुरुष का द्वैत, गुण और विवेकज्ञान। अन्तर यह है कि योग ईश्वर को स्वीकार करता है और उसे ध्यान का लक्ष्य भी बनाता है, इसीलिए इसे सेश्वर सांख्य कहा जाता है। समाधि से कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।
प्रसिद्ध कथन
अथ योगानुशासनम् (योगसूत्र 1.1) — भावानुवाद: अब योग का अनुशासन प्रारम्भ होता है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (योगसूत्र 1.2) — भावानुवाद: चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
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स्रोत: योगसूत्र