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दान

शब्दावली

अन्य नाम: दान-पुण्य, दानवीरता

धर्मपुण्यपरोपकार

दान का अर्थ है अपनी वस्तु, धन, अन्न, ज्ञान या समय का योग्य पात्र को श्रद्धापूर्वक तथा निःस्वार्थ भाव से अर्पण करना। शास्त्रों में दान को धर्म का एक प्रमुख अंग तथा पुण्य का सरल साधन बताया गया है। सत्कर्मों में दान का स्थान अत्यंत ऊँचा है, क्योंकि इससे अभिमान टूटता है, लोभ घटता है और परोपकार की वृत्ति बढ़ती है।

शास्त्रों में दान के प्रमुख भेद हैं — द्रव्य-दान (धन, अन्न), विद्या-दान (ज्ञान), अभय-दान (भय से रक्षा) तथा अन्न-दान। इनमें अन्न-दान तथा अभय-दान को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। दान सात्विक, राजसिक तथा तामसिक — तीन प्रकार का होता है; निष्काम तथा श्रद्धा से दिया गया दान सात्विक है। सत्पात्र को दिया गया दान ही फलदायी होता है।

महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में दान की महिमा के अनेक उदाहरण हैं — राजा हरिश्चंद्र, कर्ण तथा शिबि आदि दानवीरों की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि दान देना चाहिए, किंतु मूर्खतापूर्वक नहीं; देश, काल तथा पात्र का विचार करके किया गया दान श्रेष्ठ है।

प्रसिद्ध कथन

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्॥ (भगवद्गीता 17.20 — भावानुवाद: जो दान बिना प्रतिफल की अपेक्षा के, देश, काल तथा पात्र देखकर दिया जाता है, वह सात्विक दान कहलाता है।)

संबंधित

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स्रोत: भगवद्गीता