व्रत
शब्दावली
अन्य नाम: व्रत-उपवास, व्रत धारण
व्रत का अर्थ है प्रतिज्ञा या संकल्प। धार्मिक अर्थ में व्रत वह नियम है जिसे मनुष्य श्रद्धा तथा संकल्पपूर्वक, किसी देवता या कामना की पूर्ति के लिए निश्चित अवधि तक पालता है। इसमें प्रायः उपवास, विशेष देवता-पूजन, नियम-संयम तथा कुछ वर्जनाएँ सम्मिलित रहती हैं। व्रत का मूल उद्देश्य इंद्रिय-संयम, मन की शुद्धि तथा भगवान की कृपा प्राप्त करना है।
प्रमुख व्रतों में एकादशी, प्रदोष, सोमवार, मंगलवार, शिवरात्रि, नवरात्रि, सत्यनारायण, करवा चौथ, तीज तथा रामनवमी आदि हैं। प्रत्येक व्रत का अपना विधान, कथा तथा फल होता है, जो व्रत-कथाओं तथा पुराणों में वर्णित है। उपवास में कुछ लोग पूर्ण अन्न-त्याग करते हैं, कुछ फलाहार लेते हैं — यह शक्ति तथा परंपरा के अनुसार होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि व्रत का पालन शुद्ध मन, सत्य भाषण, क्रोध-त्याग तथा दया के साथ होना चाहिए; केवल भूखा रहना व्रत नहीं है। व्रत भंग होने पर प्रायश्चित्त का विधान है। व्रत से मन को संयम, धैर्य तथा आत्म-शक्ति मिलती है और भक्त में ईश्वर के प्रति श्रद्धा गहरी होती है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: स्कंद पुराण