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पुण्य

शब्दावली

अन्य नाम: पुण्य कर्म

कर्मफलधर्म

पुण्य का अर्थ है शुभ तथा धर्म-युक्त कर्मों से अर्जित शुभ फल या संस्कार। जब मनुष्य शास्त्र-विहित कर्म करता है — दान, यज्ञ, तपस्या, सत्य, अहिंसा तथा परोपकार — तब उसे पुण्य प्राप्त होता है। पुण्य वह शुभ बल है जो उसे सुख, समृद्धि, उत्तम योनि तथा स्वर्ग प्रदान करता है।

पुण्य तथा पाप का सिद्धांत कर्म-सिद्धांत पर आधारित है। शास्त्रों में कहा गया है कि प्राणी अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुःख तथा जन्म-मरण प्राप्त करता है। पुण्य का फल स्वर्ग में भोगा जाता है, परंतु वह फल समाप्त होने पर पुनः मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ता है; इसीलिए पुण्य भी अंततः बंधन ही है, यद्यपि शुभ बंधन।

पुण्य के प्रमुख साधन हैं — दान, यज्ञ, तीर्थ-यात्रा, व्रत, तपस्या, गुरु-सेवा, वेद-पाठ तथा परोपकार। शास्त्रों में कहा गया है कि पुण्य-पाप का लेखा चित्रगुप्त रखते हैं और यमराज कर्म-फल के अनुसार न्याय करते हैं। सच्चा पुण्य वह है जो निष्काम भाव से, फल की आकांक्षा के बिना किया जाए।

प्रसिद्ध कथन

पुण्य का फल स्वर्ग तथा पाप का फल नरक होता है — दोनों कर्म के अनुसार प्राप्त होते हैं। (भावानुवाद — स्मृति-परंपरा)

संबंधित

पापकर्मधर्मदानस्वर्गनरक

स्रोत: मनुस्मृति