प्रकृति
शब्दावली
अन्य नाम: प्रधान, मूल प्रकृति
प्रकृति सांख्य और योग दर्शन की जड़ (अचेतन) मूल सत्ता है और सृष्टि का उपादान कारण मानी जाती है। वह सनातन और सूक्ष्म है, अर्थात् प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु अनुमान से जानी जाती है। पुरुष के संयोग से इसका परिणाम अर्थात् सर्ग आरम्भ होता है।
प्रकृति की परिभाषा है — सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था (संतुलित अवस्था)। सत्त्व प्रकाश और ज्ञान का, रजस् क्रिया और वेग का, तथा तमस जड़ता और आवरण का गुण है। जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तब सृष्टि का विकास आरम्भ होता है।
प्रकृति से क्रमशः महत् या बुद्धि, अहंकार, पाँच तन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय) और पाँच महाभूत विकसित होते हैं। इस प्रकार प्रकृति ही समस्त जड़ और मानसिक जगत् का स्रोत है।
सांख्य में प्रकृति को पुरुष के भोग और अपवर्ग (मोक्ष) के लिए कार्यरत माना गया है। विवेकज्ञान होने पर प्रकृति अपना कार्य समाप्त कर लौट जाती है और पुरुष कैवल्य को प्राप्त होता है।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: सांख्यकारिका