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वर्णाश्रम

शब्दावली

अन्य नाम: वर्णाश्रम धर्म, चतुराश्रम

वर्णआश्रमधर्म

वर्णाश्रम शब्द दो शब्दों से बना है — वर्ण तथा आश्रम। वर्ण समाज का चार-भागीय विभाजन है (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और आश्रम जीवन की चार अवस्थाएँ हैं — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। इन दोनों को मिलाकर वर्णाश्रम धर्म कहा जाता है, जो व्यक्ति के कर्तव्यों को उसके स्वभाव तथा जीवन-अवस्था के अनुसार निर्धारित करता है।

आश्रम-व्यवस्था के अनुसार मनुष्य का जीवन चार चरणों में बाँटा गया है। ब्रह्मचर्य में विद्यार्थी गुरु के पास रहकर वेद तथा शास्त्रों का अध्ययन करता है; गृहस्थ में विवाह करके परिवार, समाज तथा यज्ञ-दान आदि का पालन करता है; वानप्रस्थ में वन में जाकर सांसारिक मोह त्यागकर तपस्या करता है; और संन्यास में पूर्ण वैराग्य लेकर मोक्ष की साधना करता है।

गृहस्थ आश्रम को इन चारों में आधारभूत कहा गया है, क्योंकि इसी से अन्य आश्रम तथा यज्ञ-परंपरा चलती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और अवस्था के अनुसार धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायता करना है।

प्रसिद्ध कथन

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास — जीवन के ये चार आश्रम माने गए हैं। (भावानुवाद)

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स्रोत: मनुस्मृति