चतुर्युग
शब्दावली
अन्य नाम: चतुर्युग, युग, चार युग
चतुर्युग अर्थात् चार युगों का समूह — सत्य (कृत) युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। ये क्रमशः घटते धर्म के काल हैं।
शास्त्रीय आधार: माना जाता है कि सत्ययुग में धर्म चार पैरों (चरणों) पर, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलियुग में एक पैर पर रहता है। युगों की आयु क्रमशः 4:3:2:1 के अनुपात में मानी जाती है।
विस्तृत अर्थ: चारों युगों को मिलाकर एक 'महायुग' या 'चतुर्युग' होता है; हजार महायुगों का एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) माना जाता है। राम का अवतार त्रेता में और कृष्ण का द्वापर में माना जाता है।
उदाहरण: महाभारत की कथा द्वापर के अंत और कलियुग के आरंभ की संधि पर मानी जाती है।
प्रसिद्ध कथन
'कृते चतुष्पात् धर्मः' — सत्ययुग में धर्म चार चरणों वाला था। (भावानुवाद)
'युगे युगे धर्मः हीयते' — युग-युग में धर्म घटता है। (भावानुवाद)
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मनुस्मृति