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ब्रह्मसूत्र

शब्दावली

अन्य नाम: वेदान्तसूत्र, उत्तर मीमांसा सूत्र, शारीरक सूत्र

वेदांतसूत्रब्रह्मन्याय प्रस्थान

ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन का आधार ग्रंथ है, जिसके प्रणेता महर्षि बादरायण माने जाते हैं, जिन्हें परम्परा वेदव्यास से एक मानती है। इसे वेदान्तसूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र और शारीरक सूत्र भी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों के बिखरे दार्शनिक विचारों को एक सुसंगत सिद्धान्त के रूप में संकलित किया गया है।

इसके चार अध्याय हैं — समन्वय, अविरोध, साधन और फल; प्रत्येक अध्याय के चार पाद हैं और कुल सूत्रों की संख्या 555 मानी जाती है। पहला सूत्र है "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" और दूसरा "जन्माद्यस्य यतः", अर्थात् जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और लय होता है, वह ब्रह्म है।

यह प्रस्थानत्रयी का "न्याय प्रस्थान" कहलाता है, क्योंकि यह वेदान्त को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है। सूत्र अत्यन्त संक्षिप्त होने के कारण इन पर अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखे — शंकराचार्य का अद्वैत भाष्य, रामानुज का श्रीभाष्य और मध्वाचार्य का भाष्य प्रमुख हैं।

प्रसिद्ध कथन

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा (ब्रह्मसूत्र 1.1.1) — भावानुवाद: अब ब्रह्म की जिज्ञासा की जाती है।
जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्मसूत्र 1.1.2) — भावानुवाद: जिससे इस जगत् का जन्म आदि होता है, वह ब्रह्म है।

संबंधित

वेदांतउपनिषदब्रह्मआत्माषड्दर्शनभगवद्गीता

स्रोत: ब्रह्मसूत्र