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जीव

शब्दावली

अन्य नाम: जीवात्मा, बद्ध आत्मा

आत्माबन्धनअविद्याकर्म

जीव का अर्थ है बद्ध आत्मा — वह चेतना जो अज्ञान (अविद्या) और कर्म के कारण संसार में बँधी हुई है। शुद्ध आत्मा और जीव में वास्तविक भेद नहीं, बल्कि अविद्या की उपाधि से जीव सीमित और कर्ता-भोक्ता प्रतीत होता है।

जीव और ब्रह्म के सम्बन्ध पर सम्प्रदायों के मत भिन्न हैं। अद्वैत के अनुसार जीव ब्रह्म ही है, जो अज्ञान से भिन्न प्रतीत होता है; द्वैत के अनुसार जीव और ब्रह्म सदा भिन्न रहते हैं; विशिष्टाद्वैत के अनुसार जीव ब्रह्म का अंश अथवा शरीर है। ये सब उपनिषद् और गीता को आधार मानते हैं।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीव उनका सनातन अंश है। कर्म और पुनर्जन्म का भोक्ता यही जीव है, और मोक्ष में इसका बन्धन नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जीव का पूरा इतिहास बन्धन से मुक्ति की ओर एक यात्रा है।

प्रसिद्ध कथन

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः (भगवद्गीता 15.7) — भावानुवाद: इस जीवलोक में सनातन जीव मेरा ही अंश है।

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आत्माब्रह्मसंसारपुनर्जन्ममायामोक्ष

स्रोत: भगवद्गीता