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पुनर्जन्म

शब्दावली

अन्य नाम: पुनरावर्तन, पुनर्जनन

जन्म-मरणकर्मसंसारआत्मा

पुनर्जन्म का अर्थ है मृत्यु के पश्चात् कर्म-फल के अनुसार पुनः जन्म ग्रहण करना। यह भारतीय दर्शन और शास्त्रों की मूल मान्यता है, जिसका आधार उपनिषद्, गीता और स्मृतियाँ हैं। आत्मा नित्य है, केवल देह बदलती है।

मृत्यु पर स्थूल देह नष्ट होती है, किन्तु सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) कर्म-संस्कार लेकर आगे की योनि में जाता है। किए गए शुभ-अशुभ कर्म ही यह निर्धारित करते हैं कि जीव किस योनि और किस लोक में जन्म लेगा। इसीलिए शास्त्रों में कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म अटूट रूप से जुड़े हैं।

गीता में कहा गया है — जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म भी निश्चित है। स्वर्ग अथवा नरक में पुण्य-पाप का भोग करने के बाद जीव पुनः मृत्युलोक में जन्म लेता है। ज्ञान, भक्ति अथवा योग से इस आवागमन का अन्त होता है, और यही मोक्ष है।

प्रसिद्ध कथन

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (भगवद्गीता 2.27) — भावानुवाद: जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म भी निश्चित है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन् (भगवद्गीता 2.20) — भावानुवाद: आत्मा न कभी जन्म लेता है और न मरता है।

संबंधित

संसारआत्माकर्मनरकस्वर्गमोक्ष

स्रोत: भगवद्गीता