भक्ति
शब्दावली
अन्य नाम: भक्ति योग, भक्ति-मार्ग
भक्ति का अर्थ है ईश्वर के प्रति अनन्य, निर्मल प्रेम तथा पूर्ण शरणागति। भक्ति-मार्ग में साधक भगवान को प्रिय मानकर उनसे प्रेम करता है, उनका गुणगान करता है और अपना सर्वस्व उन्हें अर्पित कर देता है। यह ज्ञान तथा कर्म की तुलना में सरल और सबके लिए सुलभ मार्ग माना गया है, क्योंकि इसमें केवल शुद्ध प्रेम तथा विश्वास की आवश्यकता होती है।
नारद भक्ति सूत्र में भक्ति को परम प्रेम कहा गया है, और शांडिल्य भक्ति सूत्र में अनन्य आसक्ति। भागवत तथा अन्य ग्रंथों में नवधा भक्ति का वर्णन है — श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य तथा आत्म-निवेदन। प्रह्लाद, ध्रुव तथा मीरा आदि भक्तों की कथाएँ भक्ति की महिमा बताती हैं।
भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय भक्ति योग कहलाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्त शुद्ध भाव से उन्हें पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, वह प्रेमपूर्वक दिया गया उपहार उन्हें प्रिय है। भक्ति के द्वारा साधक को न केवल सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, बल्कि वह भगवान को ही प्राप्त कर लेता है।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: भगवद्गीता