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ॐ

शब्दावली

अन्य नाम: ओंकार, प्रणव

मंत्रब्रह्मउपनिषद्

ॐ (ओंकार) को प्रणव कहा जाता है। यह तीन ध्वनियों — अ, उ तथा म — से बना है, जो क्रमशः जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थाओं के प्रतीक हैं। ॐ को ब्रह्म का शब्द-स्वरूप तथा समस्त मंत्रों का बीज माना गया है। माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ॐ से ही समस्त वेद तथा जगत् प्रकट हुए।

मांडूक्य उपनिषद् में ॐ की सबसे गहन व्याख्या मिलती है। उसमें कहा गया है — ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम् — अर्थात् ॐ ही यह समस्त जगत् है; भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब कुछ। अ, उ तथा म के अतिरिक्त उसकी चौथी अवस्था (अमात्र) तुरीय है, जो अद्वैत ब्रह्म का बोध कराती है। यह ॐ की सर्वोच्च आध्यात्मिक व्याख्या है।

ॐ का प्रयोग प्रत्येक मंत्र के आरंभ तथा अंत में होता है, और इसका जाप तथा ध्यान मोक्ष का साधन बताया गया है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋक्, साम और यजुः हैं। हर पूजा, यज्ञ तथा जप का आरंभ ॐ से होता है, और इसीलिए ॐ हिंदू धर्म का सर्वाधिक पवित्र प्रतीक है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्। (मांडूक्य उपनिषद् — भावानुवाद: ॐ ही यह समस्त जगत् है।)
वेद्यं पवित्रं ओंकार ऋक् साम यजुरेव च। (भगवद्गीता 9.17 — भावानुवाद: मैं ही जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋक्, साम और यजुः हूँ।)

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स्रोत: मांडूक्य उपनिषद्