गायत्री मंत्र
शब्दावली
अन्य नाम: गायत्री, वेदमाता गायत्री
गायत्री मंत्र वेदों का सर्वाधिक पवित्र तथा प्रसिद्ध मंत्र है, जो ऋग्वेद के तीसरे मंडल में महर्षि विश्वामित्र द्वारा दृष्ट सूक्त में मिलता है। इसका देवता सविता (सूर्य) तथा छंद गायत्री है। इसे वेदमाता कहा जाता है, क्योंकि यह समस्त वेदों का सार माना जाता है। इसका जाप प्रातः, मध्याह्न तथा सायं — तीनों संध्याओं में किया जाता है।
गायत्री मंत्र का स्वरूप है — ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥ इसका भावार्थ है — उस सविता देवता के प्रकाशमय, अत्यंत वंदनीय तेज का हम ध्यान करते हैं; वह हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे। इसमें पहले तीन पद व्याहृति (भूः, भुवः, स्वः) हैं और शेष गायत्री-त्रिपद।
गायत्री मंत्र का जाप प्रायः उपनयन-संस्कार के बाद आरंभ होता है तथा इसे प्रत्येक द्विज का नित्य कर्तव्य माना गया है। शास्त्रों में इसके अनेक लाभ बताए गए हैं — बुद्धि-शुद्धि, पाप-नाश तथा आत्मिक उन्नति। गायत्री को शक्ति, सरस्वती तथा अन्य देवियों के रूप में भी पूजा जाता है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद