शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

ऋग्वेद

शब्दावली

अन्य नाम: ऋक्, ऋग्वेद संहिता

वेदसंहितास्तुतिमन्त्र

ऋग्वेद "ऋच्" अर्थात् स्तुति-मन्त्रों के संग्रह का वेद है और चार वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसका द्रष्टा-समूह अनेक ऋषि हैं और देवता अग्नि, इन्द्र, वरुण, मित्र आदि। यह होत्र-कर्म से सम्बद्ध है, अर्थात् यज्ञ में आह्वान और स्तुति के मन्त्र इसी से लिए जाते हैं।

संहिता में दस मण्डल, 1028 सूक्त और लगभग दस हजार छह सौ मन्त्र हैं। भाषा और विषय की दृष्टि से सबसे प्राचीन मण्डल 2 से 7 तक के माने जाते हैं, जबकि प्रथम और दशम मण्डल में दार्शनिक सूक्त अधिक हैं। सामवेद और यजुर्वेद के अनेक मन्त्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं, इसीलिए इसे वैदिक वाङ्मय का मूल कहा जाता है।

इसी में गायत्री मन्त्र (3.62.10), पुरुषसूक्त (10.90), नासदीय सूक्त (10.129) और ऋषि दीर्घतमा का वाक्य "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (1.164.46) मिलता है। इन सूक्तों में सृष्टि, एकेश्वरवाद और ज्ञान की ऊँची दृष्टि दिखाई देती है।

प्रसिद्ध कथन

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद 1.164.46) — भावानुवाद: सत्य एक है, विद्वान् उसे अनेक नामों से कहते हैं।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् (ऋग्वेद 10.90.1, पुरुषसूक्त)

संबंधित

चार वेदयजुर्वेदसामवेदअथर्ववेदब्राह्मण ग्रंथगायत्री मंत्र

स्रोत: ऋग्वेद