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संसार

शब्दावली

अन्य नाम: भव-चक्र, संसार-चक्र

जन्म-मरणकर्मबन्धनचक्र

संसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का नाम है, जिसमें जीव अपने कर्म के अनुसार योनि-दर-योनि भ्रमण करता है। "संसृ" धातु से बना यह शब्द एक साथ बहने अथवा निरन्तर चलते रहने का भाव देता है। यह चक्र कभी रुकता नहीं, जब तक ज्ञान या भक्ति से इसका अन्त न हो।

इस बन्धन का मूल कारण अविद्या (आत्म-स्वरूप का अज्ञान) और कर्म है। जीव अपने शुद्ध स्वरूप को भूलकर देह और भोगों को ही सब कुछ मान लेता है, और इसी भ्रम से वह बार-बार जन्म लेता है। मोक्ष इसी चक्र से मुक्ति है।

गीता में इसका सुन्दर दृष्टान्त मिलता है — जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही देही जीर्ण देह छोड़कर नवीन देह धारण करता है। इस प्रकार संसार कर्म-फल के अनुसार चलने वाली अखण्ड प्रक्रिया है।

प्रसिद्ध कथन

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही (भगवद्गीता 2.22) — भावानुवाद: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए पहनता है, वैसे देही पुराने देह छोड़कर नए देह धारण करता है।

संबंधित

पुनर्जन्मकर्ममोक्षमायाजीवनरक

स्रोत: भगवद्गीता