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पाप

शब्दावली

अन्य नाम: पाप कर्म, कल्मष

कर्मफलधर्म

पाप का अर्थ है धर्म तथा शास्त्र के विरुद्ध किया गया वह कर्म जो आत्मा को दूषित करता है। हिंसा, असत्य, चोरी, पर-स्त्री-गमन, मद्यपान, लोभ तथा क्रोध आदि पाप के प्रमुख रूप हैं। शास्त्रों में पाप को कल्मष या दोष भी कहा जाता है, जो मनुष्य को बार-बार दुःख, रोग, अधोगति तथा नरक की ओर ले जाता है।

स्मृतियों तथा पुराणों में पाप के अनेक भेद बताए गए हैं — महापातक (ब्रह्म-हत्या, सुरापान, स्तेय, गुरु-पत्नी-गमन आदि) तथा उपपातक। पाप के फलस्वरूप प्राणी नरकों में यातना भोगता है या नीच योनियों में जन्म लेता है। शास्त्रों में पाप की सूची तथा उनके प्रायश्चित्त भी विस्तार से बताए गए हैं।

पाप से मुक्ति के लिए प्रायश्चित्त, दान, तपस्या, जप, तीर्थ-स्नान तथा ईश्वर-भक्ति का विधान है। कुछ पाप अत्यंत भीषण माने जाते हैं और उनका प्रायश्चित्त कठोर होता है। भगवद्गीता तथा भागवत में कहा गया है कि ईश्वर की शरण में जाने तथा नाम-जप से महान पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

प्रसिद्ध कथन

पाप का फल दुःख, रोग तथा नरक है; प्रायश्चित्त, दान तथा जप से पाप की शुद्धि होती है। (भावानुवाद — स्मृति-परंपरा)

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स्रोत: मनुस्मृति