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पुरुष

शब्दावली

अन्य नाम: पुरुष तत्त्व, चेतन तत्त्व

सांख्यचेतनाद्रष्टाआत्मा

सांख्य दर्शन में पुरुष चेतन, कूटस्थ, अकर्ता और द्रष्टा तत्त्व है। वह गुणों से रहित, नित्य और अविनाशी है। प्रकृति जड़ होकर भी सक्रिय है, जबकि पुरुष चेतन होकर भी निष्क्रिय; केवल दोनों के संयोग से सृष्टि का आरम्भ होता है।

सांख्य अनेक पुरुष मानता है, क्योंकि प्रत्येक जीव की चेतना अपने-अपने अनुभव का स्वतंत्र साक्षी है। पुरुष प्रकृति के कार्यों का द्रष्टा और भोक्ता है, पर उनका कर्ता नहीं। इसी कारण वह प्रकृति के परिणामों से अछूता रहता है।

अपने शुद्ध स्वरूप के ज्ञान से, अर्थात् प्रकृति और पुरुष के भेद के विवेक से, पुरुष कैवल्य को प्राप्त होता है। इस दृष्टि से पुरुष का बन्धन भी अज्ञान के कारण है और मुक्ति भी ज्ञान के कारण।

वैदिक और वेदान्ती दृष्टि में "पुरुष" शब्द परम पुरुष (विष्णु या नारायण) के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। ऋग्वेद का पुरुषसूक्त इसी परम पुरुष की महिमा का वर्णन करता है।

प्रसिद्ध कथन

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् (ऋग्वेद 10.90.1, पुरुषसूक्त) — भावानुवाद: पुरुष के सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण हैं।

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प्रकृतिसांख्ययोग दर्शनआत्माजीवब्रह्म

स्रोत: सांख्यकारिका