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ज्ञान

शब्दावली

अन्य नाम: ज्ञान योग, तत्त्वज्ञान

साधनाविद्यामोक्ष

ज्ञान का अर्थ है जानना। आध्यात्मिक दृष्टि से ज्ञान वह यथार्थ बोध है जिससे मनुष्य आत्मा, ब्रह्म, प्रकृति तथा जगत् के सच्चे स्वरूप को जान लेता है। यह केवल सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि अज्ञान (माया) को दूर करने वाला प्रत्यक्ष अनुभव है। उपनिषदों में ज्ञान को अमृतत्व का साधन कहा गया है।

ज्ञान के दो रूप बताए गए हैं — परा (उच्च) तथा अपरा (निम्न)। अपरा ज्ञान वेद, व्याकरण तथा ज्योतिष आदि लौकिक विद्याओं का है, जबकि परा ज्ञान वह है जिससे अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। मुंडक उपनिषद् में इसी विभाजन का वर्णन मिलता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ज्ञान को समस्त ज्ञानों में श्रेष्ठ तथा राजविद्या कहते हैं।

ज्ञान-मार्ग (ज्ञान योग) में साधक श्रवण (गुरु से सुनना), मनन (चिंतन करना) तथा निदिध्यासन (निरंतर ध्यान) — इन तीन सोपानों से सत्य का साक्षात्कार करता है। वेद, उपनिषद् तथा भगवद्गीता ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। ज्ञान, भक्ति तथा कर्म — ये तीनों मार्ग अंततः एक ही लक्ष्य, मोक्ष, की ओर ले जाते हैं।

प्रसिद्ध कथन

प्रज्ञानं ब्रह्म। (ऐतरेय उपनिषद् — भावानुवाद: चेतना ही ब्रह्म है।)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (भगवद्गीता 4.38 — भावानुवाद: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं है।)

संबंधित

चार वेदउपनिषदआत्माब्रह्ममोक्षभक्ति

स्रोत: उपनिषद्