यज्ञ
शब्दावली
अन्य नाम: यज्ञ, हवन, याग
यज्ञ का अर्थ है देवता-उद्देश्य से अग्नि में आहुति देना। वैदिक धर्म में यज्ञ केंद्रीय कर्म है, जो ऋत्विक् (पुरोहित) के नेतृत्व में किया जाता है।
शास्त्रीय आधार: यज्ञ के मुख्य भेद — अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास, चातुर्मास्य, सोमयाग (ज्योतिष्टोम आदि), अश्वमेध तथा राजसूय आदि। ऋग्वेद में यज्ञ-देवता अग्नि और सोम की स्तुति है; यज्ञ को देवता और मनुष्य के बीच सेतु कहा गया।
विस्तृत अर्थ: यज्ञ का वर्णन पंचमहायज्ञ रूप में भी है — ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ, जो गृहस्थ प्रतिदिन करता है। गीता में यज्ञ को कर्म-कौशल और जीवन-व्यवस्था का आधार कहा गया।
उदाहरण: दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ, राजसूय यज्ञ, तथा महाभारत में नैमिषारण्य का सत्र-यज्ञ प्रसिद्ध हैं।
प्रसिद्ध कथन
'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' — देवताओं ने यज्ञ द्वारा यज्ञ की उपासना की। (ऋग्वेद 10.90)
'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।' — प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा रचकर कहा। (भगवद्गीता 3.10)
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद, यजुर्वेद, भगवद्गीता, शतपथ ब्राह्मण