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गुरु-शिष्य

शब्दावली

अन्य नाम: गुरु शिष्य परंपरा, गुरुकुल परंपरा

शिक्षापरंपराज्ञान

गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय ज्ञान-परंपरा का आधार है। गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देता है (गु = अंधकार, रु = प्रकाश)। शिष्य वह है जो गुरु के पास रहकर, सेवा तथा विनय के साथ विद्या तथा जीवन-दर्शन प्राप्त करता है। यह परंपरा केवल सूचना का हस्तांतरण नहीं, बल्कि आत्मिक दीक्षा तथा अनुभव का संप्रेषण है।

प्राचीन काल में गुरुकुल में शिष्य ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करके गुरु के घर रहता था, सेवा तथा भिक्षा से निर्वाह करता और वर्षों की साधना के बाद विद्या प्राप्त करता था। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनय तथा आज्ञापालन शिष्य का परम धर्म माना जाता था। भगवद्गीता में कहा गया है कि ज्ञान को प्रणिपात (प्रणाम), परिप्रश्न (जिज्ञासा) तथा सेवा के द्वारा प्राप्त करना चाहिए।

प्रसिद्ध गुरु-शिष्य परंपराओं में वशिष्ठ तथा राम, विश्वामित्र तथा राम-लक्ष्मण, द्रोणाचार्य तथा अर्जुन, परशुराम तथा कर्ण, और वेदव्यास तथा उनके शिष्य आदि का नाम आता है। एकलव्य की गुरु-भक्ति तथा द्रोण-प्रेम की कथा आज भी गुरु-शिष्य भाव का प्रतीक है। गुरु की महिमा अनेक वाणियों तथा स्तोत्रों में गाई गई है।

प्रसिद्ध कथन

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (भगवद्गीता 4.34 — भावानुवाद: उस ज्ञान को प्रणाम, प्रश्न तथा सेवा के द्वारा जानो; तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें उपदेश देंगे।)

संबंधित

द्रोणाचार्यएकलव्यपरशुरामविश्वामित्रवेदव्यासऋषि

स्रोत: भगवद्गीता