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अधर्म

शब्दावली

अन्य नाम: अधर्म आचरण

धर्मकर्मपाप

अधर्म का अर्थ है धर्म का अभाव या विपरीत आचरण। जहाँ धर्म कर्तव्य, न्याय तथा शास्त्र-विहित मार्ग है, वहाँ अधर्म उसका उल्लंघन है — अन्याय, हिंसा, असत्य, चोरी, लोभ तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्म। शास्त्रों में कहा गया है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ अर्थात् जब-जब धर्म की हानि तथा अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। महाभारत के युद्ध का मूल कारण भी कौरवों का अधर्मी आचरण था।

अधर्म के फलस्वरूप मनुष्य को पाप लगता है और उसे दुःख तथा नरक भोगने पड़ते हैं। धर्म की रक्षा ही मानव-जीवन का परम कर्तव्य है; इसीलिए शास्त्र कहते हैं — धर्मो रक्षति रक्षितः, अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अधर्म का त्याग तथा धर्म का पालन ही शांति तथा मोक्ष का मार्ग है।

प्रसिद्ध कथन

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (भगवद्गीता 4.7)
धर्मो रक्षति रक्षितः। (भावानुवाद: धर्म रक्षित की रक्षा करता है।)

संबंधित

धर्मपापपुण्यकर्मनरकमोक्ष

स्रोत: भगवद्गीता