माया
शब्दावली
अन्य नाम: माया, अविद्या, भ्रम
माया का अर्थ है वह शक्ति जो ब्रह्म को आवृत कर जगत को सत्य प्रतीत कराती है। इसे अविद्या या भ्रम भी कहा जाता है।
शास्त्रीय आधार: श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया कि माया को प्रकृति और मायी को महेश्वर जानो। अद्वैत वेदांत में माया ब्रह्म की अनिर्वचनीय शक्ति है, जिससे जगत की विविधता प्रकट होती है।
विस्तृत अर्थ: माया के दो कार्य माने जाते हैं — आवरण (सत्य को ढकना) और विक्षेप (मिथ्या को सत्य दिखाना)। रस्सी में सर्प का भ्रम अद्वैत का प्रसिद्ध उदाहरण है।
उदाहरण: गीता में कृष्ण कहते हैं कि उनकी योगमाया से जगत मोहित है; श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को भी 'योगमाया' कहा गया।
प्रसिद्ध कथन
'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' — माया को प्रकृति और मायी को महेश्वर जानो। (श्वेताश्वतर उपनिषद 4.10)
'योगमाया-समावृतः जगत्' — योगमाया से जगत आवृत है। (भावानुवाद, गीता)
संबंधित
स्रोत: श्वेताश्वतर उपनिषद, भगवद्गीता, अद्वैत वेदांत