जप
शब्दावली
अन्य नाम: मंत्र जप, नाम-जप
जप का अर्थ है किसी मंत्र या दिव्य नाम का विधिपूर्वक, ध्यानपूर्वक तथा बार-बार उच्चारण। यह उपासना का सरलतम तथा सर्वाधिक प्रचलित साधन है। जप में मंत्र का निरंतर पुनरावर्तन मन को एकाग्र करता है, चंचलता दूर करता है और साधक को ईश्वर के निकट ले जाता है। शास्त्रों में जप को कलियुग का सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है।
जप तीन प्रकार का माना जाता है — वाचिक (स्पष्ट उच्चारण से), उपांशु (केवल होंठ हिलें, ध्वनि न हो) तथा मानसिक (केवल मन से)। इनमें मानसिक जप सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जप प्रायः माला (तुलसी, रुद्राक्ष या स्फटिक की 108 दानों की माला) की सहायता से किया जाता है। मंत्र की सिद्धि के लिए निश्चित संख्या तथा नियमितता आवश्यक मानी गई है।
जप के समय साधक को शुद्ध स्थान, शुद्ध वस्त्र, दिशा तथा मन की एकाग्रता का ध्यान रखना चाहिए। श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा शिव के नाम-जप को कलियुग में विशेष फलदायी बताया गया है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञों में वे जप-यज्ञ हैं — यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: भगवद्गीता