स्वर्ग
शब्दावली
अन्य नाम: स्वर्गलोक, द्युलोक
स्वर्ग देवताओं का उच्च लोक है, जो पुण्य-कर्म के फल के रूप में प्राप्त होता है। इसे सप्त लोकों में एक माना जाता है और इसके अधिपति देवराज इन्द्र हैं। यहाँ जीव सुख का भोग करता है, किन्तु यह सुख स्थायी नहीं है।
स्वर्ग की प्राप्ति यज्ञ, दान और तप आदि पुण्य-कर्मों से होती है। किन्तु शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि स्वर्ग का सुख अनित्य है — पुण्य क्षीण होने पर जीव को पुनः मृत्युलोक में लौटना पड़ता है। इसीलिए वेदान्त स्वर्ग को अन्तिम लक्ष्य नहीं मानता।
गीता में कहा गया है कि विशाल स्वर्गलोक का भोग करके पुण्य के क्षीण होने पर वे पुनः मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार स्वर्ग भी संसार-चक्र का ही एक पड़ाव है। मोक्ष, जो नित्य है, स्वर्ग से श्रेष्ठ माना गया है।
प्रसिद्ध कथन
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (भगवद्गीता 9.21) — भावानुवाद: पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं।
संबंधित
स्रोत: भगवद्गीता