तपस्या
शब्दावली
अन्य नाम: तप
तपस्या शब्द तप् धातु से बना है, जिसका अर्थ है तपाना या गर्म करना। जिस प्रकार अग्नि में तपाकर सोना शुद्ध होता है, उसी प्रकार व्रत, उपवास, इंद्रिय-संयम तथा कठोर साधना से मनुष्य के भीतर की अशुद्धि जलकर नष्ट होती है और आत्मिक तेज उत्पन्न होता है — इसी को तपस्या कहते हैं।
शास्त्रों में तपस्या को तीन प्रकार का बताया गया है — शारीरिक तप (देवता, द्विज, गुरु तथा ज्ञानियों का पूजन, शौच, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा), वाचिक तप (सत्य, प्रिय तथा हितकारी वाणी और स्वाध्याय) और मानसिक तप (मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम तथा भावों की शुद्धि)। भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में यह विभाजन विस्तार से मिलता है।
ऋषि-मुनियों ने घोर तपस्या से ही ज्ञान, सिद्धियाँ तथा दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कीं। ध्रुव, प्रह्लाद, भागीरथ तथा अनेक ऋषियों की कठोर तपस्या की गाथाएँ पुराणों में मिलती हैं। तपस्या का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि इच्छाओं पर विजय पाकर आत्म-शुद्धि तथा मोक्ष की ओर बढ़ना है।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: भगवद्गीता