आरण्यक
शब्दावली
अन्य नाम: अरण्यक, आरण्यक ग्रंथ
आरण्यक "वन" (अरण्य) में अध्ययन किए जाने वाले ग्रंथ हैं। ये ब्राह्मण और उपनिषद के बीच की कड़ी हैं — इनमें यज्ञ-विधि का रूपक-अर्थ, ध्यान, प्राण-विद्या और ब्रह्मविद्या के बीज मिलते हैं। इन्हें गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम की ओर बढ़े हुए साधकों के लिए माना जाता है।
इनमें यज्ञ का बाह्य कर्म नहीं, बल्कि उसका आन्तरिक अर्थ और ध्यान पर बल दिया जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि वन में रहकर इनका अध्ययन किया जाता था, जहाँ बाहरी यज्ञ-सामग्री सुलभ नहीं होती और मन ध्यान की ओर मुड़ता है।
ऐतरेय आरण्यक, बृहदारण्यक (जो शतपथ ब्राह्मण का अन्तिम भाग है) और तैत्तिरीय आरण्यक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इनके अन्तिम भाग ही आगे उपनिषदों के रूप में विकसित हुए।
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स्रोत: ऐतरेय आरण्यक