रोज़ का श्लोक
प्रतिदिन एक श्लोक — वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत एवं स्तोत्रों से।
भगवद्गीता 1.1धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुए पुत्रों ने क्या किया।भगवद्गीता 2.11श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो शोक के योग्य नहीं, उसका शोक करना और ज्ञानी होने का दावा करना — दोनों मेल नहीं खाते।भगवद्गीता 2.13जैसे देह में बचपन, यौवन और वृद्धावस्था बदलती है, वैसे ही आत्मा देह बदलता है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।भगवद्गीता 2.14सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख इन्द्रियों के संपर्क से आते-जाते रहते हैं; इन्हें धैर्य से सहन करना चाहिए।भगवद्गीता 2.20आत्मा कभी जन्मता या मरता नहीं; वह अजन्मा, नित्य और शाश्वत है — शरीर मरने पर भी वह नहीं मरता।भगवद्गीता 2.22जैसे पुराने वस्त्र छोड़कर नए पहने जाते हैं, वैसे ही देही जीर्ण शरीर छोड़कर नए शरीर धारण करता है।भगवद्गीता 2.23आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गीला कर सकता है, न वायु सुखा सकती है।भगवद्गीता 2.47कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में नहीं; फल की आसक्ति और अकर्म की प्रवृत्ति दोनों छोड़ दे।भगवद्गीता 2.48आसक्ति छोड़कर योग में स्थित होकर कर्म कर; सिद्धि-असिद्धि में समान रहना ही समत्व यानी योग है।भगवद्गीता 2.62विषयों का बार-बार चिन्तन करने से आसक्ति, आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।भगवद्गीता 2.70जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर उसे विचलित नहीं करतीं, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ समा जाएँ वही शांति पाता है।भगवद्गीता 3.21श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, लोग वैसा ही करते हैं; संसार उसी के प्रमाण का अनुसरण करता है।भगवद्गीता 3.35गुणरहित स्वधर्म भी भलीभाँति पाले परधर्म से श्रेष्ठ है; स्वधर्म में मरना कल्याणकारी, पर परधर्म भयावह है।भगवद्गीता 4.7जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।भगवद्गीता 4.8साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।भगवद्गीता 4.34नम्रता, जिज्ञासापूर्वक प्रश्न और सेवा से ज्ञान प्राप्त करो; तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुझे उपदेश देंगे।भगवद्गीता 6.5अपने द्वारा अपना उद्धार करो, पतन न करो; आत्मा ही अपना मित्र और आत्मा ही अपना शत्रु है।भगवद्गीता 6.6जिसने अपने मन को जीत लिया, आत्मा उसका मित्र है; जो अपने को न जीत सका, आत्मा उसका शत्रु बन जाता है।भगवद्गीता 9.22जो अनन्य भाव से मेरा ध्यान और उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।भगवद्गीता 9.26भक्ति से दिया गया पत्र, पुष्प, फल या जल मैं सहर्ष ग्रहण करता हूँ — अर्पण में भाव ही मुख्य है।भगवद्गीता 9.27जो कुछ करता, खाता, हवन करता, दान देता या तप करता है — वह सब मुझे अर्पित कर दे।भगवद्गीता 11.32मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का संहार करने आया हूँ; तुझे छोड़कर भी ये सारे योद्धा नहीं रहेंगे।भगवद्गीता 12.15जिससे कोई उद्विग्न न हो और जो स्वयं भी उद्विग्न न हो, हर्ष-अमर्ष-भय से मुक्त वह भक्त मुझे प्रिय है।भगवद्गीता 18.66सब धर्म छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा; मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।भगवद्गीता 18.78जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, समृद्धि और अटल नीति होती है।ईशोपनिषद 1यह सब जगत ईश्वर से व्याप्त है; त्याग भाव से उपभोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।ईशोपनिषद 5ब्रह्म चलता भी है और नहीं; दूर भी है और पास भी — वह सबके भीतर और बाहर व्याप्त है।ईशोपनिषद 7जिसने सब भूतों को अपना ही आत्मा जाना, उस एकत्व-दर्शी को मोह और शोक कहाँ रह सकते हैं?कठोपनिषद 1.2.20आत्मा अणु से सूक्ष्म और महत् से महान् है; शांत कामनाओं वाला पुरुष ही उसकी महिमा देखता है।कठोपनिषद 1.2.23आत्मा उपदेश, बुद्धि या बहुश्रुत से नहीं मिलता; जिसे वह स्वयं चुन ले, उसी को प्राप्त होता है।कठोपनिषद 1.3.14उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों से जानो; आत्म-ज्ञान का मार्ग छुरे की धार जैसा तीक्ष्ण और दुर्गम है।मुंडकोपनिषद 3.1.1एक वृक्ष पर बैठे दो पक्षी — जीव फल भोगता है, परमात्मा साक्षी बनकर देखता रहता है।मुंडकोपनिषद 3.1.6सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं; सत्य ही वह मार्ग है जिससे ऋषिगण परम निधान तक पहुँचते हैं।छांदोग्य उपनिषद 3.14.1यह सब कुछ ब्रह्म ही है; जिससे सब उत्पन्न, लीन और पोषित होते हैं, उसकी शांत भाव से उपासना करो।छांदोग्य उपनिषद 6.2.1आरम्भ में यह सब केवल सत् था — एक ही, दूसरे रहित; अनेकता के पीछे एक ही सत्य है।छांदोग्य उपनिषद 6.8.7तत्त्वमसि — वह परम ब्रह्म तू ही है; जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं।बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.10अहं ब्रह्मास्मि — मैं ब्रह्म हूँ; आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं।बृहदारण्यक उपनिषद 2.4.5आत्मा को देखना, सुनना, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए — यही आत्म-ज्ञान का मार्ग है।तैत्तिरीय उपनिषद 2.1.1ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है और अनन्त है — यही ब्रह्म का स्वरूप है।तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.1सत्य बोलो, धर्म का पालन करो और स्वाध्याय में कभी लापरवाही मत करो।श्वेताश्वतर उपनिषद 6.11एक ही देव सब भूतों में गूढ़ रूप से व्याप्त है — वही साक्षी, चेतन, केवल और निर्गुण है।मांडूक्य उपनिषद 1ॐ यह अक्षर ही यह सब कुछ है — भूत, भविष्य और वर्तमान सब ॐकार ही है।गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10)हम उस सविता देव के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।पुरुषसूक्त (ऋग्वेद 10.90.1)उस पुरुष के सहस्र सिर, नेत्र और चरण हैं; वह सब ओर व्याप्त होकर सबके परे स्थित है।नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129.1)सृष्टि से पूर्व न सत् था, न असत्; न आकाश, न जल — केवल अगाध रहस्य था।अग्नि सूक्त (ऋग्वेद 1.1.1)मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ का पुरोहित, देवता, होता और रत्नों का श्रेष्ठ दाता है।संगच्छध्वं सूक्त (ऋग्वेद 10.191.2)साथ चलो, साथ बोलो और मन एक करो; जैसे पूर्वज देवता एक भाव से रहते थे।महामृत्युंजय मंत्र (ऋग्वेद 7.59.12)हम सुगंधित त्र्यम्बक की उपासना करते हैं; वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करके अमरत्व की ओर ले जाएँ।शान्ति मंत्र (यजुर्वेद)हे प्रभु! हम साथ रक्षित हों, साथ बढ़ें, साथ पराक्रम करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो और आपस में द्वेष न हो।पूर्णमदः शान्ति मंत्रवह पूर्ण है, यह पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण निकलता है, और पूर्ण का पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।एकं सद्विप्रा (ऋग्वेद 1.164.46)सत्य एक ही है; विद्वान उसे इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक नामों से कहते हैं।द्यौः शान्तिः शान्ति मंत्र (यजुर्वेद 36.17)द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति और देवता सब शांति हैं; वही शांति मुझे प्राप्त हो।राम रक्षा स्तोत्र (प्रारंभ)श्रीरघुनाथ का चरित सौ करोड़ विस्तार वाला है; उसका एक-एक अक्षर महापापों का नाश करता है।विष्णु सहस्रनाम (ध्यान श्लोक)सब विघ्नों की शांति के लिए श्वेत वस्त्रधारी, चन्द्रवर्ण, चतुर्भुज और प्रसन्नमुख विष्णु का ध्यान करें।विष्णु सहस्रनाम 1ॐ, विष्णु विश्वस्वरूप, भूत-भव्य-भविष्य के स्वामी और सबके आत्मा हैं — यह सहस्रनाम का प्रथम श्लोक है।आदित्य हृदय स्तोत्र (प्रारंभ)युद्ध से थके और चिन्तित श्रीराम को सामने खड़े रावण को देखकर अगस्त्य मुनि ने आदित्य हृदय स्तोत्र सुनाया।हनुमान चालीसा (प्रारंभिक दोहा)गुरु-चरणों की धूल से मन को निर्मल करके मैं श्रीराम का यश गाता हूँ, जो चारों फल देने वाला है।हनुमान चालीसा (द्वितीय दोहा)अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं पवन-पुत्र का स्मरण करता हूँ; हे हनुमान! बल, बुद्धि, विद्या दो और क्लेश हरो।हनुमान चालीसा (प्रथम चौपाई)हे ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान! आपकी जय हो; हे कपीश्वर! आप तीनों लोकों में प्रकाशित हैं।रामचरितमानस (बालकाण्ड)हे दशरथ-आँगन के विहारी श्रीराम! आप मंगल के भवन और अमंगल के हारी हैं, कृपा करें।रामचरितमानस (बालकाण्ड) 2जो राम ने रच रखा है वही होगा; कोई तर्क करके व्यर्थ बहस क्यों बढ़ाए?राम नाम दोहा (तुलसीदास)हे तुलसी! भीतर-बाहर उजाला चाहते हो तो राम-नाम का मणिदीप अपनी जीभ पर धर लो।मनुस्मृति 2.6वेद, स्मृति, साधुओं का आचार और आत्म-तुष्टि — ये सब धर्म के मूल हैं।मनुस्मृति 4.138सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो और प्रिय के लिए असत्य भी मत बोलो — यही सनातन धर्म है।मनुस्मृति 8.15नष्ट किया हुआ धर्म नष्ट करने वाले का नाश करता है और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है।योग सूत्र 1.1अब योग का अनुशासन आरम्भ होता है — यह पतंजलि योग सूत्र का प्रथम सूत्र है।योग सूत्र 1.2योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है — यही पतंजलि की योग-परिभाषा है।योग सूत्र 2.46जिसमें स्थिरता और सुख हो, वही आसन है — यही पतंजलि का आसन-लक्षण है।ब्रह्म सूत्र 1.1.1अब ब्रह्म की जिज्ञासा आरम्भ होती है — यह वेदांत दर्शन का प्रथम सूत्र है।