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श्राद्ध

शब्दावली

अन्य नाम: श्राद्ध कर्म, पितृ-कर्म

पितरतर्पणकर्म

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। यह वह धार्मिक कर्म है जो मनुष्य अपने मृत पितरों (पूर्वजों) के निमित्त श्रद्धापूर्वक करता है। इसमें पितरों को तर्पण (जल-अर्पण), पिंड-दान तथा ब्राह्मण-भोजन आदि सम्मिलित हैं। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध से पितरों को तृप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है और कर्ता को पुण्य मिलता है।

पितृपक्ष (भाद्रपद कृष्ण पक्ष) श्राद्ध का प्रमुख समय है, जिसमें लोग अपने पितरों का श्राद्ध तथा तर्पण करते हैं। इसके अतिरिक्त मृत्यु-तिथि पर वार्षिक श्राद्ध, अमावस्या तथा अन्य पर्वों पर भी श्राद्ध किया जाता है। महालया, सर्वपितृ अमावस्या तथा गया-श्राद्ध आदि विशेष महत्व के अवसर हैं। गया तथा प्रयागराज पितृ-कर्म के प्रमुख तीर्थ हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि जो पुत्र अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता, उसे पितृ-ऋण से मुक्ति नहीं मिलती। मनुस्मृति तथा गरुड़ पुराण में श्राद्ध का विस्तृत विधान तथा महिमा वर्णित है। श्रद्धा-भाव ही श्राद्ध का मूल है; इसीलिए कहा जाता है कि जो श्रद्धा से किया जाए, वही श्राद्ध है।

प्रसिद्ध कथन

श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्। (भावानुवाद: जो श्रद्धा से किया जाता है, वही श्राद्ध है।)

संबंधित

पुण्यदानव्रतकर्मयमगया

स्रोत: गरुड़ पुराण