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चातुर्वर्ण्य

शब्दावली

अन्य नाम: चार वर्ण, चातुर्वर्ण्य व्यवस्था

वर्णसमाजधर्म

चातुर्वर्ण्य का अर्थ है चार वर्णों का समूह। भारतीय परंपरा में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया — ब्राह्मण (अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ तथा दान), क्षत्रिय (रक्षा, शासन तथा युद्ध), वैश्य (कृषि, पशुपालन तथा व्यापार) और शूद्र (सेवा तथा श्रम)। प्रत्येक वर्ण के कर्तव्य तथा स्वधर्म स्मृतियों में विस्तार से बताए गए हैं।

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में इस विभाजन का प्रतीकात्मक वर्णन मिलता है, जहाँ विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न माने गए हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि चारों वर्णों की रचना उन्होंने गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की है।

इससे स्पष्ट है कि शास्त्रों में वर्ण-व्यवस्था का आधार जन्म नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव (गुण) तथा कर्म माना गया है। चारों वर्ण मिलकर समाज-रूपी शरीर के अंग माने गए हैं, जिनमें परस्पर सहयोग तथा अपने-अपने स्वधर्म का पालन अपेक्षित है।

प्रसिद्ध कथन

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (ऋग्वेद — पुरुषसूक्त)
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। (भगवद्गीता 4.13)

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वर्णाश्रमधर्मकर्ममनुपुरुषार्थ

स्रोत: ऋग्वेद