तंत्र
शब्दावली
अन्य नाम: तन्त्र, तंत्र शास्त्र
तंत्र शब्द तन् धातु से बना है, जिसका अर्थ है विस्तार करना या फैलाना। तंत्र शास्त्र वह विद्या है जिसमें मंत्र, यंत्र, देवता-आराधना, पूजा-विधि तथा विभिन्न साधनाओं के द्वारा देवी या देवता की कृपा प्राप्त की जाती है। इसमें मुख्य रूप से शक्ति (देवी) की उपासना का प्राधान्य है।
तंत्र ग्रंथ मुख्यतः संवाद के रूप में हैं, जिनमें भगवान शिव पार्वती (देवी) को तथा भगवान विष्णु लक्ष्मी को तंत्र का उपदेश देते हैं। प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथों में माहेश्वरी संहिता, कुलार्णव तंत्र, रुद्रयामल तंत्र तथा तंत्रराज तंत्र आदि हैं। इनमें मंत्र-सिद्धि, यंत्र-निर्माण, दीक्षा, पूजा-विधि तथा कवच-स्तोत्र आदि का वर्णन मिलता है।
तंत्र में दो मुख्य मार्ग माने गए हैं — दक्षिणाचार (शुद्ध तथा संयमित) और वामाचार (कठिन तथा गोपनीय)। सामान्य साधक के लिए दक्षिणाचार ही उपयुक्त माना जाता है। तंत्र का उद्देश्य भोग और मोक्ष, दोनों की प्राप्ति बताया गया है — भुक्तिं मुक्तिं च। लोक-प्रचलित भ्रांतियों के विपरीत वास्तविक तंत्र साधना कठोर अनुशासन, गुरु-दीक्षा तथा शुद्धाचार पर आधारित है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: कुलार्णव तंत्र