शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

सांख्य

शब्दावली

अन्य नाम: सांख्य दर्शन, सांख्यकारिका दर्शन

दर्शनप्रकृतिपुरुषगुण

सांख्य दर्शन के आदि आचार्य महर्षि कपिल माने जाते हैं। परम्परा में उपलब्ध सबसे प्रमुख ग्रंथ ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका है, जिसमें बहत्तर कारिकाओं में इसका सार है। "सांख्य" का अर्थ है विश्लेषण अथवा गणना, क्योंकि यह जगत् को गिने हुए तत्वों में बाँटकर समझाता है।

इसके अनुसार दो स्वतंत्र और सनातन सत्ताएँ हैं — जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष। प्रकृति सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था है। प्रकृति जड़ होकर भी सक्रिय है और पुरुष चेतन होकर भी निष्क्रिय; दोनों के संयोग से सृष्टि (सर्ग) आरम्भ होता है।

सांख्य पच्चीस तत्व मानता है — प्रकृति, पुरुष और तेईस विकार (महत् या बुद्धि, अहंकार, मन, दस इन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्रा और पाँच महाभूत)। सृष्टि को यह ईश्वर-कृत न मानकर प्रकृति के विकास की प्रक्रिया मानता है, इसीलिए परम्परा में इसे निरीश्वरवादी कहा जाता है, यद्यपि गीता और भागवत में कपिल का ईश्वरवादी रूप भी मिलता है।

जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष के भेद का विवेकज्ञान ही मोक्ष का साधन है। अपने शुद्ध, अकर्ता-द्रष्टा स्वरूप के ज्ञान से पुरुष कैवल्य को प्राप्त होता है।

प्रसिद्ध कथन

सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति: — भावानुवाद: सत्त्व, रजस् और तमस् की संतुलित अवस्था ही प्रकृति है।
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त (सांख्यकारिका 3) — भावानुवाद: मूल प्रकृति अविकृति है, और महत् आदि सात प्रकृति तथा विकृति दोनों हैं।

संबंधित

योग दर्शनप्रकृतिपुरुषषड्दर्शनवेदांतआत्मा

स्रोत: सांख्यकारिका