ब्रह्म
शब्दावली
अन्य नाम: ब्रह्मन्, परब्रह्म, परम तत्त्व
ब्रह्म परम तत्त्व है और समस्त जगत् का मूल कारण। "बृह्" धातु से बना यह शब्द वृद्धि और विस्तार का सूचक है, अर्थात् जो अनन्त है। उपनिषदों का सम्पूर्ण प्रतिपादन ब्रह्म के स्वरूप के इर्द-गिर्द घूमता है।
ब्रह्मसूत्र का दूसरा सूत्र "जन्माद्यस्य यतः" इसकी परिभाषा देता है — जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और लय होता है, वह ब्रह्म है। तैत्तिरीय उपनिषद् इसे "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" कहता है, अर्थात् ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है। इसीलिए इसे सच्चिदानन्द स्वरूप कहा जाता है।
ब्रह्म के दो प्रकार से वर्णन मिलते हैं — निर्गुण ब्रह्म, जो सब गुणों और रूपों से परे है, और सगुण ब्रह्म, जो ईश्वर के रूप में जगत् के स्वामी तथा सृष्टि-स्थिति-संहार के नियन्ता हैं। अद्वैत वेदान्त निर्गुण ब्रह्म पर और भक्ति-सम्प्रदाय सगुण ब्रह्म पर बल देते हैं।
ऋग्वेद का वाक्य "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" बताता है कि सत्य एक है, विद्वान् उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। इस प्रकार ब्रह्म अनेक देवताओं और नामों के पीछे का एक ही आधार है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: तैत्तिरीय उपनिषद