आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
आयुर्वेद, ज्योतिष तथा योग-साधना की मूल संकल्पनाएँ एवं साधन।
त्रिदोषवात, पित्त और कफ — शरीर की तीन मूल जैविक शक्तियाँ, जिनके संतुलन से स्वास्थ्य रहता है।वातवायु तत्व से बना दोष, जो शरीर में गति, श्वास और तंत्रिका-कार्यों का संचालन करता है।पित्तअग्नि तत्व प्रधान दोष, जो पाचन, चयापचय और शरीर की ऊष्मा को नियंत्रित करता है।कफजल और पृथ्वी तत्व प्रधान दोष, जो शरीर की संरचना, स्नेहन और स्थिरता बनाए रखता है।अग्नि (आयुर्वेद)जठराग्नि — पाचन की केंद्रीय शक्ति, जिसके मंद होने से आम बनता है और रोग उत्पन्न होते हैं।आमअपचित अन्न और दोषों से बना अपाच्य पदार्थ, जो स्रोतस् में रुककर रोग का कारण बनता है।ओजसभी धातुओं का सार — शरीर की प्रतिरोधक शक्ति और जीवन-तेज का आधार।धातुशरीर के सात मूल ऊतक — रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।स्रोतस्शरीर के सूक्ष्म मार्ग या नलिकाएँ, जिनसे धातु और पोषक तत्वों का संचार होता है।रसायनआयु, बल, ओज और स्मृति बढ़ाने वाली चिकित्सा-शाखा तथा वह औषधि जो कायाकल्प करे।दिनचर्याप्रातः जागरण से रात्रि-निद्रा तक की दैनिक दिनचर्या, जो स्वास्थ्य की रक्षा करती है।ऋतुचर्याप्रत्येक ऋतु के अनुसार आहार-विहार का नियम, जो दोषों के संतुलन से स्वास्थ्य बनाए रखता है।औषधिरोगों को दूर करने वाला द्रव्य — वनस्पतिज, खनिज या प्राणिज, जो विधिपूर्वक प्रयोग किया जाए।त्रिफलाहरीतकी, विभीतकी और आमलकी — तीन फलों का मिश्रण, जो पाचन और नेत्र के लिए हितकारी है।अश्वगंधाबल और वीर्य बढ़ाने वाला वात-शामक रसायन, जिसे भारतीय जिनसेंग भी कहते हैं।हरिद्राहल्दी — कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य वाला द्रव्य, जो कफ-पित्त शामक और व्रणरोपक है।तुलसीपवित्र औषधीय पौधा, जो कफ-वात शामक, ज्वरघ्न और प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाला है।आमलकीआँवला — वात-पित्त-कफ तीनों को शांत करने वाला, विटामिन-सी से भरपूर रसायन फल।ब्राह्मीमस्तिष्क और स्मृति को बल देने वाला शीतल औषधीय पौधा, जो पित्त-शामक है।शतावरीबल, स्तन्य और स्त्री-स्वास्थ्य के लिए हितकारी शीतल, वात-पित्त शामक रसायन।चरकचरक संहिता के रचयिता महर्षि, जिन्हें आयुर्वेद की कायचिकित्सा परंपरा का श्रेष्ठ आचार्य माना जाता है।सुश्रुतसुश्रुत संहिता के रचयिता महर्षि, जिन्हें शल्यचिकित्सा (सर्जरी) का जनक माना जाता है।राशिजन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से तय होने वाली बारह राशियों में से एक।नक्षत्रचंद्र-पथ पर स्थित सत्ताईस तारा-समूह, जिनसे जन्म-नक्षत्र तय होता है।तिथिचंद्र और सूर्य के बीच बारह अंश के अंतर से बनने वाली काल-इकाई।वारसप्ताह के सात दिन, जिनमें प्रत्येक का एक स्वामी ग्रह होता है।मुहूर्तशुभ कार्य आरंभ करने हेतु शास्त्रोक्त रूप से चुना गया शुभ समय।पंचांगतिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण — इन पाँच अंगों वाला काल-निर्णय।लग्नजन्म के क्षण में पूर्व क्षितिज पर उदित राशि; कुंडली का प्रथम भाव।कुंडलीजन्म-समय के ग्रह, नक्षत्र और लग्न का भाव-चक्र में अंकित चित्र।दशाग्रहों के आधार पर जीवन-काल का खंडों में विभाजन; फलादेश का आधार।मंगल दोषकुंडली में मंगल की अशुभ स्थिति से उत्पन्न विवाह-संबंधी दोष।कालसर्प दोषराहु और केतु के बीच सभी ग्रहों की स्थिति से उत्पन्न दोष।यम एवं नियमयोग के आठ अंगों में प्रथम दो — सामाजिक संयम तथा व्यक्तिगत अनुशासन।आसनअष्टांग योग का तीसरा अंग; शरीर की स्थिर और सुखद स्थिति।प्राणायामअष्टांग योग का चौथा अंग; श्वास की गति पर संयम।प्रत्याहारअष्टांग योग का पाँचवाँ अंग; इंद्रियों का अपने विषयों से हट जाना।धारणाअष्टांग योग का छठा अंग; चित्त को एक देश में बाँधना।ध्यानअष्टांग योग का सातवाँ अंग; एक ही वस्तु पर प्रत्यय की निरंतरता।समाधिअष्टांग योग का आठवाँ अंग; चित्त का ध्येय में पूर्ण लीन हो जाना।चक्रसूक्ष्म शरीर में स्थित ऊर्जा-केंद्र; कुंडलिनी-योग में सात प्रमुख चक्र।कुंडलिनीमूलाधार में सुप्त सर्पिणी-शक्ति, जो साधना से ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार पहुँचती है।मुद्राहठयोग की क्रिया, जिससे शरीर-स्थिति तथा संकेत के द्वारा प्राण नियंत्रित होता है।बंधहठयोग की क्रिया, जिससे प्राण को शरीर के विशेष भागों में बाँधा जाता है।इडा-पिंगलासुषुम्ना के दोनों ओर स्थित चंद्र तथा सूर्य की दो प्रमुख नाड़ियाँ।सुषुम्नामेरुदंड में स्थित मध्य नाड़ी, जो कुंडलिनी के ऊर्ध्वगमन का मार्ग है।षट्कर्महठयोग की छह शुद्धि-क्रियाएँ — धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि और कपालभाति।