त्रिदोष
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: त्रिदोष सिद्धांत, तीन दोष
आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ — ये तीन दोष शरीर की मूल जैविक शक्तियाँ माने जाते हैं। ये पंचमहाभूतों से बने हैं और शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन करते हैं। इनका सम्यक् अर्थात संतुलित रूप शरीर को स्वस्थ रखता है और विकृत रूप रोग उत्पन्न करता है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता — दोनों में त्रिदोष सिद्धांत आयुर्वेद का आधार बताया गया है। चरक के अनुसार रोग तब होता है जब दोष अपने स्थान से बढ़कर शरीर के अन्य भागों में फैल जाते हैं; सुश्रुत ने इनके विकृत होने पर उत्पन्न विकारों का विस्तृत वर्णन किया है।
प्रत्येक मनुष्य में ये तीनों दोष रहते हैं, पर उनके अनुपात से प्रकृति अर्थात वात-प्रकृति, पित्त-प्रकृति और कफ-प्रकृति बनती है। आयुर्वेद का लक्ष्य विकृत दोषों को संतुलित करना है — यही स्वास्थ्य-रक्षा और रोग-निवारण का मूल है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता