वात
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: वायु, वात दोष
वात दोष वायु और आकाश महाभूत से बना है। यह शरीर में गति का सिद्धांत है — श्वास, रक्त-संचार, मल-मूत्र का निष्कासन, नाड़ी-संचार और विचार, सब वात के अधीन हैं। इसका स्वभाव रूक्ष, हल्का, शीतल, चल और सूक्ष्म है।
चरक संहिता में वात को वायु कहकर सभी दोषों का प्रधान बताया गया है; सुश्रुत संहिता ने इसे शरीर की सभी चेष्टाओं का संचालक कहा है। वात के पाँच भेद हैं — प्राण, उदान, व्यान, समान और अपान, जो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं।
वात के बढ़ने पर शुष्कता, दर्द, कंपन, कब्ज, अनिद्रा और चिंता जैसे विकार होते हैं। इसका शमन स्निग्ध, उष्ण और गुरु आहार, अभ्यंग, स्वेदन तथा नियमित दिनचर्या से किया जाता है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) जो शरीर में गति और चेष्टा उत्पन्न करता है, वही वात है; इसके बिना शरीर जड़ के समान है।
संबंधित
स्रोत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता