ध्यान
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: ध्यान, भावना
ध्यान अष्टांग योग का सातवाँ अंग है। इसमें ध्येय वस्तु पर चित्त की एक-सी वृत्ति निरंतर बनी रहती है।
योग सूत्र में कहा गया है — 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्', अर्थात् वहाँ एक ही प्रत्यय की अखंड धारा ध्यान है। धारणा के स्थिर होने पर ध्यान प्रकट होता है।
ध्यान से मन शुद्ध, शांत तथा एकाग्र होता है। यह समाधि का पूर्वाभ्यास और आत्म-ज्ञान का साधन है।
प्रसिद्ध कथन
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्। (योग सूत्र 3.2)
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स्रोत: योग सूत्र