पित्त
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: पित्त दोष, अग्नि-दोष
पित्त दोष अग्नि और जल महाभूत से बना है। यह शरीर में पाचन, चयापचय और ऊष्मा का प्रतिनिधित्व करता है। इसका स्वभाव उष्ण, तीक्ष्ण, तरल, हल्का और सर है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में पित्त को अग्नि का शरीरगत रूप बताया गया है, जो अन्न को पचाता और धातुओं में परिणत करता है। इसके पाँच भेद हैं — पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और भ्राजक।
पित्त के बढ़ने पर ज्वर, दाह, अम्लता, पित्त-विकार, क्रोध और त्वचा-रोग होते हैं। शीतल, मधुर और स्निग्ध आहार, घी, दूध, चंदन तथा शीतल औषधियों से इसका शमन होता है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) पित्त शरीर की ऊष्मा और पाचन-शक्ति है; इसके संतुलित रहने पर बल और वर्ण बढ़ते हैं।
संबंधित
स्रोत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता