अग्नि (आयुर्वेद)
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: जठराग्नि, पाचकाग्नि
आयुर्वेद में अग्नि का अर्थ जठराग्नि से है — वह पाचक शक्ति जो उदर में अन्न को पचाकर रस और मल में बाँटती है। यह शरीर की समस्त चयापचय-क्रियाओं का मूल है।
चरक संहिता में रोगों का मूल मंदाग्नि बताया गया है; जब अग्नि मंद होती है तो अन्न ठीक से नहीं पचता और आम बनता है। सुश्रुत संहिता ने भी अग्नि की रक्षा को स्वास्थ्य का आधार कहा है। इसके भेद हैं — जठराग्नि, धात्वाग्नि और भूताग्नि।
संतुलित अग्नि से बल, वर्ण, आयु और उत्साह बढ़ते हैं; मंदाग्नि से आम, अजीर्ण और अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। दीपन-पाचन औषधियाँ, उचित आहार-विहार और उपवास से अग्नि को प्रबल किया जाता है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) शरीर में जो अन्न को पचाती और बल देती है, वही अग्नि है; इसके मंद होते ही रोग आरंभ होते हैं।
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स्रोत: चरक संहिता