समाधि
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: समाधि
समाधि अष्टांग योग का आठवाँ तथा अंतिम अंग है। इसमें चित्त ध्येय वस्तु में इस प्रकार लीन हो जाता है कि उसका अपना रूप शून्य जैसा हो जाता है।
योग सूत्र में कहा गया है — 'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः', अर्थात् केवल ध्येय का आभास रहना और अपने स्वरूप का शून्य जैसा हो जाना समाधि है।
समाधि योग का चरम लक्ष्य तथा आत्म-साक्षात्कार की अवस्था मानी जाती है। इसमें साधक और ध्येय के बीच का भेद मिट जाता है।
प्रसिद्ध कथन
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः। (योग सूत्र 3.3)
संबंधित
स्रोत: योग सूत्र