ऋतुचर्या
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: ऋतु-अनुसार चर्या, ऋतु-नियम
ऋतुचर्या का अर्थ है प्रत्येक ऋतु के अनुसार आहार और विहार का नियम। प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना ही ऋतुचर्या है।
चरक संहिता के सूत्रस्थान (तस्याशितीय अध्याय) में छह ऋतुओं — शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमंत — की चर्या का विस्तृत वर्णन है। सुश्रुत संहिता ने भी ऋतु-अनुसार दोषों की वृद्धि और क्षय बताया है।
ऋतु के अनुसार आहार-विहार न करने से दोष विकृत होकर ऋतुज रोग उत्पन्न करते हैं। उचित ऋतुचर्या से शरीर प्रकृति के अनुकूल रहता है और रोगों से बचाव होता है। यह दिनचर्या का विस्तार है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) प्रकृति जिस ऋतु में जैसी हो, शरीर को उसी के अनुसार आहार और विहार देना चाहिए।
संबंधित
स्रोत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता