ओज
आयुर्वेद, ज्योतिष एवं योग
अन्य नाम: बल, शरीर-सार
ओज सभी सात धातुओं का सार है। यह शरीर में स्थित जीवन-तेज है, जो बल, वर्ण, प्रतिरोधक शक्ति और मनःस्थैर्य का आधार है। इसे बल का सूक्ष्म स्वरूप भी कहा जाता है।
चरक संहिता में ओज को शरीर का सार तथा रोग-निरोधक तत्व बताया गया है; इसके नाश से प्राण भी नष्ट होते हैं। सुश्रुत संहिता ने ओज को अमृत कहकर हृदय में स्थित बताया है।
ओज के क्षय से दुर्बलता, भय, चिंता, क्षीण स्वर और रोग-प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है। रसायन, ब्रह्मचर्य, संतुलित आहार और शांत मन से ओज की वृद्धि होती है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) ओज शरीर का सार-तेज है; जिसमें ओज पूर्ण है, उसे रोग शीघ्र नहीं जीतते।
संबंधित
स्रोत: चरक संहिता, सुश्रुत संहिता