कठोपनिषद 1.2.20
रोज़ का श्लोक
अर्थ — यह आत्मा अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी महान् है, जीव की गुहा (हृदय) में स्थित है। जिसकी कामनाएँ शांत हो गई हैं, वह वीतशोक पुरुष धाता की कृपा से आत्मा की महिमा देखता है।
कठोपनिषद का यह मंत्र आत्मा की सूक्ष्मता और विराटता दोनों दिखाता है। शुद्ध हृदय और शांत इच्छाओं वाला पुरुष ही इसका दर्शन कर पाता है।
श्लोक
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः॥
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स्रोत: कठोपनिषद