कठोपनिषद 1.3.14
रोज़ का श्लोक
अन्य नाम: उत्तिष्ठत जाग्रत
अर्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों को प्राप्त करके जानो। ज्ञानीजन कहते हैं कि यह मार्ग छुरे की धार के समान तीक्ष्ण और दुर्गम है।
कठोपनिषद का यह प्रसिद्ध आह्वान मनुष्य को आत्म-जागृति के लिए प्रेरित करता है। आत्म-ज्ञान का मार्ग कठिन है, इसलिए सतर्कता और गुरु-कृपा आवश्यक है।
श्लोक
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
संबंधित
स्रोत: कठोपनिषद